लूका 9

1 फिर उस ने बारहों को बुलाकर उन्हें सब दुष्टात्माओं और बिमारियों को दूर करने की सामर्थ और अधिकार दिया।

2 और उन्हें परमेश्वर के राज्य का प्रचार करने, और बिमारों को अच्छा करने के लिये भेजा।

3 और उस ने उससे कहा, मार्ग के लिये कुछ न लेना: न तो लाठी, न झोली, न रोटी, न रूपये और न दो दो कुरते।

4 और जिस किसी घर में तुम उतरो, वहीं रहो; और वहीं से विदा हो।

5 जो कोई तुम्हें ग्रहण न करेगा उस नगर से निकलते हुए अपने पांवों की धूल झाड़ डालो, कि उन पर गवाही हो।

6 सो वे निकलकर गांव गांव सुसमाचार सुनाते, और हर कहीं लोगों को चंगा करते हुए फिरते रहे॥

7 और देश की चौथाई का राजा हेरोदेस यह सब सुनकर घबरा गया, क्योंकि कितनों ने कहा, कि यूहन्ना मरे हुओं में से जी उठा है।

8 और कितनों ने यह, कि एलिय्याह दिखाई दिया है: औरों ने यह, कि पुराने भविष्यद्वक्ताओं में से कोई जी उठा है।

9 परन्तु हेरोदेस ने कहा, युहन्ना का तो मैं ने सिर कटवाया अब यह कौन है, जिस के विषय में ऐसी बातें सुनता हूं? और उस ने उसे देखने की इच्छा की॥

10 फिर प्रेरितों ने लौटकर जो कुछ उन्होंने किया था, उस को बता दिया, और वह उन्हें अलग करके बैतसैदा नाम एक नगर को ले गया।

11 यह जानकर भीड़ उसके पीछे हो ली: और वह आनन्द के साथ उन से मिला, और उन से परमेश्वर के राज्य की बातें करने लगा: और जो चंगे होना चाहते थे, उन्हें चंगा किया।

12 जब दिन ढलने लगा, तो बारहों ने आकर उससे कहा, भीड़ को विदा कर, कि चारों ओर के गावों और बस्तियों में जाकर टिकें, और भोजन का उपाय करें, क्योंकि हम यहां सुनसान जगह में हैं।

13 उस ने उन से कहा, तुम ही उन्हें खाने को दो: उन्होंने कहा, हमारे पास पांच रोटियां और दो मछली को छोड़ और कुछ नहीं: परन्तु हां, यदि हम जाकर इन सब लोगों के लिये भोजन मोल लें, तो हो सकता है: वे लोग तो पांच हजार पुरूषों के लगभग थे।

14 तब उस ने अपने चेलों से कहा, उन्हें पचास पचास करके पांति में बैठा दो।

15 उन्होंने ऐसा ही किया, और सब को बैठा दिया।

16 तब उस ने वे पांच रोटियां और दो मछली लीं, और स्वर्ग की और देखकर धन्यवाद किया, और तोड़ तोड़कर चेलों को देता गया, कि लोगों को परोसें।

17 सो सब खाकर तृप्त हुए, और बचे हुए टुकड़ों से बारह टोकरी भरकर उठाईं॥

18 जब वह एकान्त में प्रार्थना कर रहा था, और चेले उसके साथ थे, तो उस ने उन से पूछा, कि लोग मुझे क्या कहते हैं?

19 उन्होंने उत्तर दिया, युहन्ना बपतिस्मा देनेवाला, और कोई कोई एलिय्याह, और कोई यह कि पुराने भविष्यद्वक्ताओं में से कोई जी उठा है।

20 उस ने उन से पूछा, परन्तु तुम मुझे क्या कहते हो? पतरस ने उत्तर दिया, परमेश्वर का मसीह।

21 तब उस ने उन्हें चिताकर कहा, कि यह किसी से न कहना।

22 और उस ने कहा, मनुष्य के पुत्र के लिये अवश्य है, कि वह बहुत दुख उठाए, और पुरिनए और महायाजक और शास्त्री उसे तुच्छ समझकर मार डालें, और वह तीसरे दिन जी उठे।

23 उस ने सब से कहा, यदि कोई मेरे पीछे आना चाहे, तो अपने आप से इन्कार करे और प्रति दिन अपना क्रूस उठाए हुए मेरे पीछे हो ले।

24 क्योंकि जो कोई अपना प्राण बचाना चाहेगा वह उसे खोएगा, परन्तु जो कोई मेरे लिये अपना प्राण खोएगा वही उसे बचाएगा।

25 यदि मनुष्य सारे जगत को प्राप्त करे, और अपना प्राण खो दे, या उस की हानि उठाए, तो उसे क्या लाभ होगा?

26 जो कोई मुझ से और मेरी बातों से लजाएगा; मनुष्य का पुत्र भी जब अपनी, और अपने पिता की, और पवित्र स्वर्ग दूतों की, महिमा सहित आएगा, तो उस से लजाएगा।

27 मैं तुम से सच कहता हूं, कि जो यहां खड़े हैं, उन में से कोई कोई ऐसे हैं कि जब तक परमेश्वर का राज्य न देख लें, तब तक मृत्यु का स्वाद न चखेंगे।

28 इन बातों के कोई आठ दिन बाद वह पतरस और यूहन्ना और याकूब को साथ लेकर प्रार्थना करने के लिये पहाड़ पर गया।

29 जब वह प्रार्थना कर ही रहा था, तो उसके चेहरे का रूप बदल गया: और उसका वस्त्र श्वेत होकर चमकने लगा।

30 और देखो, मूसा और एलिय्याह, ये दो पुरूष उसके साथ बातें कर रहे थे।

31 ये महिमा सहित दिखाई दिए; और उसके मरने की चर्चा कर रहे थे, जो यरूशलेम में होनेवाला था।

32 पतरस और उसके साथी नींद से भरे थे, और जब अच्छी तरह सचेत हुए, तो उस की महिमा; और उन दो पुरूषों को, जो उसके साथ खड़े थे, देखा।

33 जब वे उसके पास से जाने लगे, तो पतरस ने यीशु से कहा; हे स्वामी, हमारा यहां रहना भला है: सो हम तीन मण्डप बनाएं, एक तेरे लिये, एक मूसा के लिये, और एक एलिय्याह के लिये। वह जानता न था, कि क्या कह रहा है।

34 वह यह कह ही रहा था, कि एक बादल ने आकर उन्हें छा लिया, और जब वे उस बादल से घिरने लगे, तो डर गए।

35 और उस बादल में से यह शब्द निकला, कि यह मेरा पुत्र और मेरा चुना हुआ है, इस की सुनो।

36 यह शब्द होते ही यीशु अकेला पाया गया: और वे चुप रहे, और कुछ देखा था, उस की कोई बात उन दिनों में किसी से न कही॥

37 और दूसरे दिन जब वे पहाड़ से उतरे, तो एक बड़ी भीड़ उस से आ मिली।

38 और देखो, भीड़ में से एक मनुष्य ने चिल्ला कर कहा, हे गुरू, मैं तुझ से बिनती करता हूं, कि मेरे पुत्र पर कृपा दृष्टि कर; क्योंकि वह मेरा एकलौता है।

39 और देख, एक दुष्टात्मा उसे पकड़ता है, और वह एकाएक चिल्ला उठता है; और वह उसे ऐसा मरोड़ता है, कि वह मुंह में फेन भर लाता है; और उसे कुचलकर कठिनाई से छोड़ता है।

40 और मै ने तेरे चेलों से बिनती की, कि उसे निकालें; परन्तु वे न निकाल सके।

41 यीशु न उत्तर दिया, हे अविश्वासी और हठीले लोगो, मैं कब तक तुम्हारे साथ रहूंगा, और तुम्हारी सहूंगा? अपने पुत्र को यहां ले आ।

42 वह आ ही रहा था कि दुष्टात्मा ने उसे पटक कर मरोड़ा, परन्तु यीशु ने अशुद्ध आत्मा को डांटा और लकड़े को अच्छा करके उसके पिता को सौंप दिया।

43 तब सब लोग परमेश्वर के महासामर्थ से चकित हुए॥

44 परन्तु जब सब लोग उन सब कामों से जो वह करता था, अचम्भा कर रहे थे, तो उस ने अपने चेलों से कहा; ये बातें तुम्हारे कानों में पड़ी रहें, क्योंकि मनुष्य का पुत्र मनुष्यों के हाथ में पकड़वाया जाने को है।

45 परन्तु वे इस बात को न समझते थे, और यह उन से छिपी रही; कि वे उसे जानने न पाएं, और वे इस बात के विषय में उस से पूछने से डरते थे॥

46 फिर उन में यह विवाद होने लगा, कि हम में से बड़ा कौन है?

47 पर यीशु ने उन के मन का विचार जान लिया : और एक बालक को लेकर अपने पास खड़ा किया।

48 और उन से कहा; जो कोई मेरे नाम से इस बालक को ग्रहण करता है, वह मुझे ग्रहण करता है; और जो कोई मुझे ग्रहण करता है, वह मेरे भेजने वाले को ग्रहण करता है क्योंकि जो तुम में सब से छोटे से छोटा है, वही बड़ा है।

49 तब युहन्ना ने कहा, हे स्वामी, हम ने एक मनुष्य को तेरे नाम से दुष्टात्माओं को निकालते देखा, और हम ने उसे मना किया, क्योंकि वह हमारे साथ होकर तेरे पीछे नहीं हो लेता।

50 यीशु ने उस से कहा, उसे मना मत करो; क्योंकि जो तुम्हारे विरोध में नहीं, वह तुम्हारी ओर है॥

51 जब उसके ऊपर उठाए जाने के दिन पूरे होने पर थे, जो उस ने यरूशलेम को जाने का विचार दृढ़ किया।

52 और उस ने अपने आगे दूत भेजे: वे सामरियों के एक गांव में गए, कि उसके लिये जगह तैयार करें।

53 परन्तु उन लोगों ने उसे उतरने न दिया, क्योंकि वह यरूशलेम को जा रहा था।

54 यह देखकर उसके चेले याकूब और यूहन्ना ने कहा; हे प्रभु; क्या तू चाहता है, कि हम आज्ञा दें, कि आकाश से आग गिरकर उन्हें भस्म कर दे।

55 परन्तु उस ने फिरकर उन्हें डांटा और कहा, तुम नहीं जानते कि तुम कैसी आत्मा के हो।

56 क्योंकि मनुष्य का पुत्र लोगों के प्राणों को नाश करने नहीं वरन बचाने के लिये आया है: और वे किसी और गांव में चले गए॥

57 जब वे मार्ग में चले जाते थे, तो किसी न उस से कहा, जहां जहां तू जाएगा, मैं तेरे पीछे हो लूंगा।

58 यीशु ने उस से कहा, लोमडिय़ों के भट और आकाश के पक्षियों के बसेरे होते हैं, पर मनुष्य के पुत्र को सिर धरने की भी जगह नहीं।

59 उस ने दूसरे से कहा, मेरे पीछे हो ले; उस ने कहा; हे प्रभु, मुझे पहिले जाने दे कि अपने पिता को गाड़ दूं।

60 उस ने उस से कहा, मरे हुओं को अपने मुरदे गाड़ने दे, पर तू जाकर परमेश्वर के राज्य की कथा सुना।

61 एक और ने भी कहा; हे प्रभु, मैं तेरे पीछे हो लूंगा; पर पहिले मुझे जाने दे कि अपने घर के लोगों से विदा हो आऊं।

62 यीशु ने उस से कहा; जो कोई अपना हाथ हल पर रखकर पीछे देखता है, वह परमेश्वर के राज्य के योग्य नहीं॥

1 Then he called his twelve disciples together, and gave them power and authority over all devils, and to cure diseases.

2 And he sent them to preach the kingdom of God, and to heal the sick.

3 And he said unto them, Take nothing for your journey, neither staves, nor scrip, neither bread, neither money; neither have two coats apiece.

4 And whatsoever house ye enter into, there abide, and thence depart.

5 And whosoever will not receive you, when ye go out of that city, shake off the very dust from your feet for a testimony against them.

6 And they departed, and went through the towns, preaching the gospel, and healing every where.

7 Now Herod the tetrarch heard of all that was done by him: and he was perplexed, because that it was said of some, that John was risen from the dead;

8 And of some, that Elias had appeared; and of others, that one of the old prophets was risen again.

9 And Herod said, John have I beheaded: but who is this, of whom I hear such things? And he desired to see him.

10 And the apostles, when they were returned, told him all that they had done. And he took them, and went aside privately into a desert place belonging to the city called Bethsaida.

11 And the people, when they knew it, followed him: and he received them, and spake unto them of the kingdom of God, and healed them that had need of healing.

12 And when the day began to wear away, then came the twelve, and said unto him, Send the multitude away, that they may go into the towns and country round about, and lodge, and get victuals: for we are here in a desert place.

13 But he said unto them, Give ye them to eat. And they said, We have no more but five loaves and two fishes; except we should go and buy meat for all this people.

14 For they were about five thousand men. And he said to his disciples, Make them sit down by fifties in a company.

15 And they did so, and made them all sit down.

16 Then he took the five loaves and the two fishes, and looking up to heaven, he blessed them, and brake, and gave to the disciples to set before the multitude.

17 And they did eat, and were all filled: and there was taken up of fragments that remained to them twelve baskets.

18 And it came to pass, as he was alone praying, his disciples were with him: and he asked them, saying, Whom say the people that I am?

19 They answering said, John the Baptist; but some say, Elias; and others say, that one of the old prophets is risen again.

20 He said unto them, But whom say ye that I am? Peter answering said, The Christ of God.

21 And he straitly charged them, and commanded them to tell no man that thing;

22 Saying, The Son of man must suffer many things, and be rejected of the elders and chief priests and scribes, and be slain, and be raised the third day.

23 And he said to them all, If any man will come after me, let him deny himself, and take up his cross daily, and follow me.

24 For whosoever will save his life shall lose it: but whosoever will lose his life for my sake, the same shall save it.

25 For what is a man advantaged, if he gain the whole world, and lose himself, or be cast away?

26 For whosoever shall be ashamed of me and of my words, of him shall the Son of man be ashamed, when he shall come in his own glory, and in his Father’s, and of the holy angels.

27 But I tell you of a truth, there be some standing here, which shall not taste of death, till they see the kingdom of God.

28 And it came to pass about an eight days after these sayings, he took Peter and John and James, and went up into a mountain to pray.

29 And as he prayed, the fashion of his countenance was altered, and his raiment was white and glistering.

30 And, behold, there talked with him two men, which were Moses and Elias:

31 Who appeared in glory, and spake of his decease which he should accomplish at Jerusalem.

32 But Peter and they that were with him were heavy with sleep: and when they were awake, they saw his glory, and the two men that stood with him.

33 And it came to pass, as they departed from him, Peter said unto Jesus, Master, it is good for us to be here: and let us make three tabernacles; one for thee, and one for Moses, and one for Elias: not knowing what he said.

34 While he thus spake, there came a cloud, and overshadowed them: and they feared as they entered into the cloud.

35 And there came a voice out of the cloud, saying, This is my beloved Son: hear him.

36 And when the voice was past, Jesus was found alone. And they kept it close, and told no man in those days any of those things which they had seen.

37 And it came to pass, that on the next day, when they were come down from the hill, much people met him.

38 And, behold, a man of the company cried out, saying, Master, I beseech thee, look upon my son: for he is mine only child.

39 And, lo, a spirit taketh him, and he suddenly crieth out; and it teareth him that he foameth again, and bruising him hardly departeth from him.

40 And I besought thy disciples to cast him out; and they could not.

41 And Jesus answering said, O faithless and perverse generation, how long shall I be with you, and suffer you? Bring thy son hither.

42 And as he was yet a coming, the devil threw him down, and tare him. And Jesus rebuked the unclean spirit, and healed the child, and delivered him again to his father.

43 And they were all amazed at the mighty power of God. But while they wondered every one at all things which Jesus did, he said unto his disciples,

44 Let these sayings sink down into your ears: for the Son of man shall be delivered into the hands of men.

45 But they understood not this saying, and it was hid from them, that they perceived it not: and they feared to ask him of that saying.

46 Then there arose a reasoning among them, which of them should be greatest.

47 And Jesus, perceiving the thought of their heart, took a child, and set him by him,

48 And said unto them, Whosoever shall receive this child in my name receiveth me: and whosoever shall receive me receiveth him that sent me: for he that is least among you all, the same shall be great.

49 And John answered and said, Master, we saw one casting out devils in thy name; and we forbad him, because he followeth not with us.

50 And Jesus said unto him, Forbid him not: for he that is not against us is for us.

51 And it came to pass, when the time was come that he should be received up, he stedfastly set his face to go to Jerusalem,

52 And sent messengers before his face: and they went, and entered into a village of the Samaritans, to make ready for him.

53 And they did not receive him, because his face was as though he would go to Jerusalem.

54 And when his disciples James and John saw this, they said, Lord, wilt thou that we command fire to come down from heaven, and consume them, even as Elias did?

55 But he turned, and rebuked them, and said, Ye know not what manner of spirit ye are of.

56 For the Son of man is not come to destroy men’s lives, but to save them. And they went to another village.

57 And it came to pass, that, as they went in the way, a certain man said unto him, Lord, I will follow thee whithersoever thou goest.

58 And Jesus said unto him, Foxes have holes, and birds of the air have nests; but the Son of man hath not where to lay his head.

59 And he said unto another, Follow me. But he said, Lord, suffer me first to go and bury my father.

60 Jesus said unto him, Let the dead bury their dead: but go thou and preach the kingdom of God.

61 And another also said, Lord, I will follow thee; but let me first go bid them farewell, which are at home at my house.

62 And Jesus said unto him, No man, having put his hand to the plough, and looking back, is fit for the kingdom of God.

Luke 5 in Tamil and English

1 जब भीड़ उस पर गिरी पड़ती थी, और परमेश्वर का वचन सुनती थी, और वह गन्नेसरत की झील के किनारे पर खड़ा था, तो ऐसा हुआ।
And it came to pass, that, as the people pressed upon him to hear the word of God, he stood by the lake of Gennesaret,

2 कि उस ने झील के किनारे दो नावें लगी हुई देखीं, और मछुवे उन पर से उतरकर जाल धो रहे थे।
And saw two ships standing by the lake: but the fishermen were gone out of them, and were washing their nets.

3 उन नावों में से एक पर जो शमौन की थी, चढ़कर, उस ने उस से बिनती की, कि किनारे से थोड़ा हटा ले चले, तब वह बैठकर लोगों को नाव पर से उपदेश देने लगा।
And he entered into one of the ships, which was Simon’s, and prayed him that he would thrust out a little from the land. And he sat down, and taught the people out of the ship.

4 जब वे बातें कर चुका, तो शमौन से कहा, गहिरे में ले चल, और मछिलयां पकड़ने के लिये अपने जाल डालो।
Now when he had left speaking, he said unto Simon, Launch out into the deep, and let down your nets for a draught.

5 शमौन ने उसको उत्तर दिया, कि हे स्वामी, हम ने सारी रात मिहनत की और कुछ न पकड़ा; तौभी तेरे कहने से जाल डालूंगा।
And Simon answering said unto him, Master, we have toiled all the night, and have taken nothing: nevertheless at thy word I will let down the net.

6 जब उन्होंने ऐसा किया, तो बहुत मछिलयां घेर लाए, और उन के जाल फटने लगे।
And when they had this done, they inclosed a great multitude of fishes: and their net brake.

7 इस पर उन्होंने अपने साथियों को जो दूसरी नाव पर थे, संकेत किया, कि आकर हमारी सहायता करो: और उन्होंने आकर, दोनो नाव यहां तक भर लीं कि वे डूबने लगीं।
And they beckoned unto their partners, which were in the other ship, that they should come and help them. And they came, and filled both the ships, so that they began to sink.

8 यह देखकर शमौन पतरस यीशु के पांवों पर गिरा, और कहा; हे प्रभु, मेरे पास से जा, क्योंकि मैं पापी मनुष्य हूं।
When Simon Peter saw it, he fell down at Jesus’ knees, saying, Depart from me; for I am a sinful man, O Lord.

9 क्योंकि इतनी मछिलयों के पकड़े जाने से उसे और उसके साथियों को बहुत अचम्भा हुआ।
For he was astonished, and all that were with him, at the draught of the fishes which they had taken:

10 और वैसे ही जब्दी के पुत्र याकूब और यूहन्ना को भी, जो शमौन के सहभागी थे, अचम्भा हुआ: तब यीशु ने शमौन से कहा, मत डर: अब से तू मनुष्यों को जीवता पकड़ा करेगा।
And so was also James, and John, the sons of Zebedee, which were partners with Simon. And Jesus said unto Simon, Fear not; from henceforth thou shalt catch men.

11 और व नावों को किनारे पर ले आए और सब कुछ छोड़कर उसके पीछे हो लिए॥
And when they had brought their ships to land, they forsook all, and followed him.

12 जब वह किसी नगर में था, तो देखो, वहां कोढ़ से भरा हुआ एक मनुष्य था, और वह यीशु को देखकर मुंह के बल गिरा, और बिनती की; कि हे प्रभु यदि तू चाहे हो मुझे शुद्ध कर सकता है।
And it came to pass, when he was in a certain city, behold a man full of leprosy: who seeing Jesus fell on his face, and besought him, saying, Lord, if thou wilt, thou canst make me clean.

13 उस ने हाथ बढ़ाकर उसे छूआ और कहा मैं चाहता हूं तू शुद्ध हो जा: और उसका कोढ़ तुरन्त जाता रहा।
And he put forth his hand, and touched him, saying, I will: be thou clean. And immediately the leprosy departed from him.

14 तब उस ने उसे चिताया, कि किसी से न कह, परन्तु जा के अपने आप को याजक को दिखा, और अपने शुद्ध होने के विषय में जो कुछ मूसा ने चढ़ावा ठहराया है उसे चढ़ा; कि उन पर गवाही हो।
And he charged him to tell no man: but go, and shew thyself to the priest, and offer for thy cleansing, according as Moses commanded, for a testimony unto them.

15 परन्तु उस की चर्चा और भी फैलती गई, और भीड़ की भीड़ उस की सुनने के लिये और अपनी बिमारियों से चंगे होने के लिये इकट्ठी हुई।
But so much the more went there a fame abroad of him: and great multitudes came together to hear, and to be healed by him of their infirmities.

16 परन्तु वह जंगलों में अलग जाकर प्रार्थना किया करता था॥
And he withdrew himself into the wilderness, and prayed.

17 और एक दिन ऐसा हुआ कि वह उपदेश दे रहा था, और फरीसी और व्यवस्थापक वहां बैठे हुए थे, जो गलील और यहूदिया के हर एक गांव से, और यरूशलेम से आए थे; और चंगा करने के लिये प्रभु की सामर्थ उसके साथ थी।
And it came to pass on a certain day, as he was teaching, that there were Pharisees and doctors of the law sitting by, which were come out of every town of Galilee, and Judaea, and Jerusalem: and the power of the Lord was present to heal them.

18 और देखो कई लोग एक मनुष्य को जो झोले का मारा हुआ था, खाट पर लाए, और वे उसे भीतर ले जाने और यीशु के साम्हने रखने का उपाय ढूंढ़ रहे थे।
And, behold, men brought in a bed a man which was taken with a palsy: and they sought means to bring him in, and to lay him before him.

19 और जब भीड़ के कारण उसे भीतर न ले जा सके तो उन्होंने कोठे पर चढ़ कर और खप्रैल हटाकर, उसे खाट समेत बीच में यीशु के साम्हने उतरा दिया।
And when they could not find by what way they might bring him in because of the multitude, they went upon the housetop, and let him down through the tiling with his couch into the midst before Jesus.

20 उस ने उन का विश्वास देखकर उस से कहा; हे मनुष्य, तेरे पाप क्षमा हुए।
And when he saw their faith, he said unto him, Man, thy sins are forgiven thee.

21 तब शास्त्री और फरीसी विवाद करने लगे, कि यह कौन है, जो परमेश्वर की निन्दा करता है? परमेश्वर का छोड़ कौन पापों की क्षमा कर सकता है?
And the scribes and the Pharisees began to reason, saying, Who is this which speaketh blasphemies? Who can forgive sins, but God alone?

22 यीशु ने उन के मन की बातें जानकर, उन से कहा कि तुम अपने मनों में क्या विवाद कर रहे हो?
But when Jesus perceived their thoughts, he answering said unto them, What reason ye in your hearts?

23 सहज क्या है? क्या यह कहना, कि तेरे पाप क्षमा हुए, या यह कहना कि उठ, और चल फिर?
Whether is easier, to say, Thy sins be forgiven thee; or to say, Rise up and walk?

24 परन्तु इसलिये कि तुम जानो कि मनुष्य के पुत्र को पृथ्वी पर पाप क्षमा करने का भी अधिकार है (उस ने उस झोले के मारे हुए से कहा), मैं तुझ से कहता हूं, उठ और अपनी खाट उठाकर अपने घर चला जा।
But that ye may know that the Son of man hath power upon earth to forgive sins, (he said unto the sick of the palsy,) I say unto thee, Arise, and take up thy couch, and go into thine house.

25 वह तुरन्त उन के साम्हने उठा, और जिस पर वह पड़ा था उसे उठाकर, परमेश्वर की बड़ाई करता हुआ अपने घर चला गया।
And immediately he rose up before them, and took up that whereon he lay, and departed to his own house, glorifying God.

26 तब सब चकित हुए और परमेश्वर की बड़ाई करने लगे, और बहुत डरकर कहने लगे, कि आज हम ने अनोखी बातें देखी हैं॥
And they were all amazed, and they glorified God, and were filled with fear, saying, We have seen strange things to day.

27 और इसके बाद वह बाहर गया, और लेवी नाम एक चुंगी लेने वाले को चुंगी की चौकी पर बैठे देखा, और उस से कहा, मेरे पीछे हो ले।
And after these things he went forth, and saw a publican, named Levi, sitting at the receipt of custom: and he said unto him, Follow me.

28 तब वह सब कुछ छोड़कर उठा, और उसके पीछे हो लिया।
And he left all, rose up, and followed him.

29 और लेवी ने अपने घर में उसके लिये बड़ी जेवनार की; और चुंगी लेने वालों की और औरों की जो उसके साथ भोजन करने बैठे थे एक बड़ी भीड़ थी।
And Levi made him a great feast in his own house: and there was a great company of publicans and of others that sat down with them.

30 और फरीसी और उन के शास्त्री उस के चेलों से यह कहकर कुड़कुड़ाने लगे, कि तुम चुंगी लेने वालों और पापियों के साथ क्यों खाते-पीते हो?
But their scribes and Pharisees murmured against his disciples, saying, Why do ye eat and drink with publicans and sinners?

31 यीशु ने उन को उत्तर दिया; कि वैद्य भले चंगों के लिये नहीं, परन्तु बीमारों के लिये अवश्य है।
And Jesus answering said unto them, They that are whole need not a physician; but they that are sick.

32 मैं धमिर्यों को नहीं, परन्तु पापियों को मन फिराने के लिये बुलाने आया हूं।
I came not to call the righteous, but sinners to repentance.

33 और उन्होंने उस से कहा, यूहन्ना के चेले तो बराबर उपवास रखते और प्रार्थना किया करते हैं, और वैसे ही फरीसियों के भी, परन्तु तेरे चेले तो खाते पीते हैं!
And they said unto him, Why do the disciples of John fast often, and make prayers, and likewise the disciples of the Pharisees; but thine eat and drink?

34 यीशु ने उन से कहा; क्या तुम बरातियों से जब तक दूल्हा उन के साथ रहे, उपवास करवा सकते हो? ।
And he said unto them, Can ye make the children of the bridechamber fast, while the bridegroom is with them?

35 परन्तु वे दिन आएंगे, जिन में दूल्हा उन से अलग किया जाएगा, तब वे उन दिनों में उपवास करेंगे।
But the days will come, when the bridegroom shall be taken away from them, and then shall they fast in those days.

36 उस ने एक और दृष्टान्त भी उन से कहा; कि कोई मनुष्य नये पहिरावन में से फाड़कर पुराने पहिरावन में पैबन्द नहीं लगाता, नहीं तो नया फट जाएगा और वह पैबन्द पुराने में मेल भी नहीं खाएगा।
And he spake also a parable unto them; No man putteth a piece of a new garment upon an old; if otherwise, then both the new maketh a rent, and the piece that was taken out of the new agreeth not with the old.

37 और कोई नया दाखरस पुरानी मशकों में नही भरता, नहीं तो नया दाखरस मशकों को फाड़कर बह जाएगा, और मशकें भी नाश हो जाएंगी।
And no man putteth new wine into old bottles; else the new wine will burst the bottles, and be spilled, and the bottles shall perish.

38 परन्तु नया दाखरस नई मशकों में भरना चाहिये।
But new wine must be put into new bottles; and both are preserved.

39 कोई मनुष्य पुराना दाखरस पीकर नया नहीं चाहता क्योंकि वह कहता है, कि पुराना ही अच्छा है॥
No man also having drunk old wine straightway desireth new: for he saith, The old is better.